गैरसैंण नहीं तो देहरादून ही बनाओ स्थाई राजधानी, पर बनाओ

गैरसैंण नहीं तो देहरादून ही बनाओ स्थाई राजधानी, पर बनाओ

द्वारा चंद्रशेखर बुड़ाकोटी की वाल से

देहरादून।
पिछले चार साल से गैरसैंण में हो रहे सालाना जलसे को करीब से देखते-बूझते-डूबते हुए अब लगता है कि सरकार को अब फैसला ले ही लेना चाहिए। चूंकि किसी भी राजनीतिक दल में इतना नैतिक-आत्मिक बल नहीं है कि वो गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का फैसला ले सके। हरीश रावत सबसे बड़ा उदाहरण है। गैरसैण में सब कुछ कर देने के बावजूद रावत उसे राजधानी का दर्जा देने का साहस नही दिखा पाए।
और आगे भी कोई न दिखा सकेगा। लिहाजा, भ्रम में जीना छोडकर देहरादून को तत्काल स्थायी राजधानी घोषित कर दिया जाए। यहां संसाधनों पर अरबो रुपये खर्च हो चुके हैं।
कोई इस फैसले का विरोध भी नहीं करने वाला। गिने चुने लोगों की सिवा किसी को कोई मतलब भी नहीं है। मुझे याद है जब दीक्षित आयोग ने वर्ष 2003-04 में राजधानी के लिए सुझाव मांगे थे तो सवा करोड़ के उत्तराखंड में केवल 274 ही लोगों ने सुझाव दिए थे। यानि ये मुददा केवल सियासी होहल्ले तक ही सीमित है। रही बात आम आदमी की तो उसे फर्क भी नहीं पड़ता कि राजधानी कैसी और कहां हो? अपने पहाड़ में भी कई जिले ऐसे हैं जिनको देहरादून ही सूट करता है और वो खुलकर कहते भी हैं।
हकीकत यह भी है कि राजधानी के विधानसभा-सचिवालयों से आम आदमी को मतलब न कभी पहले था और न ही आगे भी होगा। उसे रोटी चाहिए। बच्चे के लिए पढ़ाई. दवाई चाहिए।
उसका काम सीएम-मिनिस्टर, सचिव, अपर सचिव से नही पटवारी, तहसीलदार, रेंजर, मास्टर, डाक्टर, कंपाउंडर, आशा, एएनएम, से ही पड़ता है। सत्ता के प्रतिष्ठानों के ईदर्गिद आपकों हमेश छुटभैया नेता, ठेकेदार, बिल्डर, शराब माफिया, दलाल टाइप भीड़ भी ज्यादा नजर आएगी। आम आदमी को केवल अपने घर के आसपास अच्छा ठीक सा सस्ता इंग्लिश मीडियम स्कूल, एक अच्छा सुविधाओं और डाक्टरों वाला अस्पताल ही चाहिए। रोजगार का जरिया चाहिए। कोशिश हो कि उसके लिए जिला-ब्लॉक स्तर पर सिस्टम को जनकेंद्रित, ठोस, पारदर्शी बना दिया जाए।
राजधानी का आडंबर जोड़ने के बजाए बजाए गैरसैंण में शिक्षा महानिदेशालय, बेसिक- माध्यमिक निदेशालय, एससीईआरटी, पशुपालन निदेशालय, उद्यान निदेशालय, सहकारिता मुख्यालय, वन मुख्यालय, शिफ्ट कर दिए जाएं। अकेला शिक्षा विभाग ही राजधानी की कमी पूरी कर देगा। ये विभाग पहाड़ के लिए मुफीद भी हैँ। फिर सरकार मॉनिटरिंग सख्त रखिये। वीडियो कांफ्रेंसिंग से समीक्षाएं करे। ऐसे में राजधानी न भी हो तो भी काम चल सकता है।
दूसरा, यह भी ध्यान रहे। राज्य की हर महीने की राजस्व आय 1300 करोड़ रुपये के करीब है। इसमें 1100 करोड के करीब वेतन-भत्ते, पेशन पर ही खर्च हो जाते हैँ। विकास के लिए बचता है केवल 150 करोड के करीब। अपने सरकारी खजाने की हालत गरीब सुदामा जैसी हैं। मंत्री-संतरियों के खर्च के बीच एक सत्र गैरसैंण में हो जाए तो उस पर ही करोड़ रुपये खर्च हो जाते हैँ। इसलिए वर्तमान में जो कुछ उपलब्ध संसाधन हैं, उनमें ही काम चलाया जाए और बेवजह एक पैसा भी खर्च न हो। वक्त आ गया है बेवजह की भावनात्मक बातों के पीछे न चला जाए और जमीनी हकीकत को समझा जाए।