कनकपाल और चांदपुरगढ़

कनकपाल और चांदपुरगढ़

 

अरविन्द शेखर की वाल से

देहरादून।सदियों पुराना है उत्तराखंड में राजधानी बदलने का इतिहास
कत्यूरी राजा अपनी राजधानी को जोशीमठ से आज के गरुड़-बैजनाथ ले गए थे
पंवार वंशी राजा चांदपुरगढ़ से देवलगढ़ फिर श्रीनगर फिर टिहरी ले गए राजधानी
चंदवंशी राजा ने 16वीं सदी में चंपावत से अल्मोड़ा स्थानांतरित की थी राजधानी
अरविंद शेखर
गैरसैंण में विधान सभा सत्र से प्रदेश की स्थायी राजधानी का सवाल जेरे बहस है। सरकार भले ही इस मामले में कुछ और इंतजार की बात कर रही हो । मसला ग्रीष्मकालीन व शीत कालीन राजधानी के बीच भी फंसा हो. मगर उत्तराखंड के इतिहास में राजधानी बदलने का इतिहास सदियों पुराना है। गढ़वाल और कुमाऊं का हालांकि बहुत क्रमबद्ध तरीके से इतिहास नहीं मिलता लेकिन माना जाता है कि कत्यूरी राजवंश पहला राजवंश था जिसने एक राजनीतिक इकाई के रूप में कुमाऊं और गढ़वाल दोनों पर राज्य किया। महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने इस वंश का काल 850 ईस्वी से 1060 ईस्वी तक माना है। माना जाता है कि इस वंश की राजधानी ज्योतिर्मठ आज का जोशीमठ रही। माना जाता है कि कार्तिकेयपुर भी यही थी। एक धारणा के मुताबिक कत्यूरी अफगानिस्तान से सिक्किम तक राज करते थे बाद में कत्यूरी राजा नारसिंह देव राजधानी को जोशीमठ से बैजनाथ ले गए। कत्यूरी वंश के अवसान का यानी 13वीं सदी के पूर्वार्ध में नेपाली आक्रांता क्राचल्लदेव ने उत्तराखंड पर हमला कर दिया। मांडलिकों की मदद से उसने उत्तराखंड को छोटे-छोटे क्षेत्रों में बाटकर शासन किया। इसी समय गढ़वाल में पंवार वंश तो कुमाऊं में चंद वंश का उदय हुआ। इन दोनो वंशों के शासकों ने कुछ क्षेत्रों में सिमटे कत्यूरी शासन का अंत कर दिया। इस तरह उत्तराखंड में पहली बार गढ़वाल और कुमाऊं दो पृथक राजनीतिक इकाइयों का जन्म हुआ।गढ़वाल के पंवार वंश की राजधानी उसके संस्थापक राजा कनकपाल के जमाने में चांदपुर गढ़ में रही। जहां आज भी उसके भग्नावशेष पाए जाते हैं। इस वंश के 37वें नरेश अजयपाल ने गढ़वाल के 52 गढ़ों को जीतकर एकीकृत गढ़वाल राज्य की स्थापना की थी। राज्य का विस्तार होने पर अजयपाल अपनी राजधानी चांदपुर गढ़ से परिवर्तित कर 1506 ईस्वी में पहले अस्थायी तौर पर देवलगढ़ ले गया फिर 1506 से 1579 ईस्वी के बीच उसने अलकनंदा नदी के तट पर स्थित श्रीनगर (गढ़वाल) को अपनी राजधानी बनाया। 1803 के भयानक भूकंप से श्रीनगर अलकनंदा में बनी विशाल झील के टूट जाने से आई भयानक बाढ़ की चपेट में आ गया और एक तरह से उसका विनाश हो गया। इससे कुछ वर्ष पहले 1790 के आसपास रोहिल्लों ने कुमाऊं पर हमला कर कब्जा कर लिया लेकिन गढ़वाल के राजा की मदद से कुमाऊं मुक्त होगया। 1787 से 1790 के बीच पूरे उत्तराखंड में एक ही शासक प्रद्युम्नशाह का शासन रहा। अब कुमाऊं और गढवाल के शासकों की आपसी फूट का फायदा उठाते हुए गोरखों ने कुमाऊं पर हमला कर कब्जा कर लिया और 1790 से 1815 तक कुमाऊं पर उनका कब्जा रहा। 1804 में गोरखों ने गढ़वाल पर भी अधिकार कर लिया। जब 1815 में गोरखे अंग्रेजों से हार गए तो ईस्ट इंडिया कंपनी ने श्रीनगर समेत अलकनंदा और मंदाकिनी नदियों के पूर्व में स्थित गढ़वाल राज्य के हिस्से को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया और देहरादून को भी सहारनपुर जनपद के साथ मिला लिया। गढ़वाल का शेष हिस्सा गढ़वाल के राजा सुदर्शन शाह को सौंप दिया गया। अब महाराजा सुदर्शन शाह ने भागीरथी भिलंगना के संगम पर स्थित धनुषतीर्थ नामक स्थान पर 28 दिसंबर 1815 को अपनी नई राजधानी टिहरी नगर की स्थापना की। कुमाऊं के चंद वंश की बात करें तो उसके संस्थापकों के बारे में विवाद है। कहीं थोहरचंद को तो कहीं अभयचंद को चंद वंश का संस्थापक माना जाता है। राजा भीष्म चंद ने अपने शासन के अंतिम चरण में यानी 16वीं सदी के मध्य में राजधानी को राज्य के केंद्रीय स्थान में स्थापित करने के लिए राजधानी को चंपावत से खगमराकोट यानी अल्मोड़ा स्थानांतरित किया। अल्मोड़ा के ही एक खसिया मुखिया गजुआ ने भीष्मचंद की हत्या कर दी। बाद में कल्याण चंद ने कुमाऊं की राजगद्दी संभाली।
ग्रीष्कालीन और शीतकालीन
राजधानी की परंपरा भी पुरानी
देहरादून। उत्तराखंड में शीतकालीन व ग्रीष्मकालीन राजधानी की परंपरा भी पुरानी है। आज के रामनगर के पास स्थित ढिकुली यानी बैराठ कत्यूरों की शीतकालीन राजधानी थी। यहां कत्यूर राजा धूप सेकने भी आते थे। वहीं ब्रिटिशकाल में नैनीताल उत्तर प्रदेश की ग्रीष्मकालीन राजधानी रहा। यही नहीं पेशावर विद्रोह के महानायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ने तो प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू को दूधातोली क्षेत्र में देश की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने का प्रस्ताव दिया था यह क्षेत्र भी गैरसैण के समीप ही है।