हिमाचल और उतराखंड, वो छुट्टी में गांव जाते हैं, हम नीचे आते हैं

हिमाचल और उतराखंड, वो छुट्टी में गांव जाते हैं, हम नीचे आते हैं

हिमाचल प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री यशवंत सिंह परमार के बारे में कहा जाता है कि वे कभी कश्मीर जाते थे तो वहां के बस अड्डों पर भी सोते थे, यह पता लगाने के लिए कि कश्मीर के सेब हिमाचल से आगे क्यों हैं। कुछ ही समय लगा और जल्दी ही हिमाचल के सेब का डंका भारत ही नहीं विश्व बाजार में बजने लगा।

बाद में मुख्यमंत्रियों ने भी परमार के रास्ते को नहीं छोड़ा। आज हिमाचल में नौ ’एपिल रिसर्च इंस्टिट्यूट’ हैं। उत्तराखण्ड में पंतनगर में ही एक ’एपिल रिसर्च इंस्टिट्यूट’ है, वह भी अंग्रेजों के जमाने का। अंग्रेजों के जाने के बाद से उत्तराखण्ड में सेब के मामले में कोई तरक्की नहीं हुई। हिमाचल के मुकाबले उत्तराखण्ड में पर्यटन व बागवानी में ज्यादा सम्भावना थी, लेकिन नीति निर्माताओं को यहां के पहाड़ और सेब में कोई सुन्दरता नहीं दिखाई दी। हिमाचल के कुफरी और नारकुण्डा के बारे में सुनते हैं,लेकिन उत्तराखण्ड में औली जाते-जाते ही फिसल जाते हैं। दयारा और पंवाली, बेदनी बुग्याल की योजनायें कहां है ?

जैसा कि हमने कहा कि हिमाचल राज्य बनने पर यशवंत परमार कश्मीर गये, दूसरे पहाड़ी क्षेत्रों में भी गये होंगे। जब उत्तराखण्ड बना तो यहां के विशेषज्ञों व जनप्रतिनिधियों ने अध्ययन के नाम पर यूरोप के देशों की फ्लाईट पकड़ी, हिमाचल व कश्मीर की गाड़ी नहीं। यूरोप के बस अड्डों पर कोई सोया हो, सुना किसी ने ?

himachal pradeshहिमाचल में पलायन न के बराबर है। पहले था, लेकिन 1971 में राज्य बनने के बाद से काफी ब्रेक लगी। उत्तराखण्ड राज्य बने 15  साल हो गये, पलायन निरन्तर जारी है। अब भी यह जुमला नेतागण भाषणों में दोहराते रहते हैं कि ’पानी और जवानी’ यहां के काम नहीं आती। इससे उनका भाषण ज्यादा प्रभावी बन जाता है और अपनी ही बेबसी व कटु सच्चाई पर यहां के लोग ताली बजाने लगते हैं।

जरूर हिमाचल के मुकाबले उत्तराखण्ड बने अभी 15 साल ही हुए हैं, लेकिन नींव तो शुरू में ही पड़ती है न। नींव तो अच्छी पड़नी चाहिये भाई। तब ही दीवारें और छत टिक पायेंगी। राजधानी पर अन्तिम निर्णय हो जाना चाहिये था। एक तरफ देहरादून में सी.एम. हाउस, राजभवन, निदेशालय बन रहे हैं और दूसरी तरफ यह कहने की हिम्मत कोई नहीं दिखा रहे कि हम सब देहरादून से नहीं जायेंगे। इतने साल में अस्थाई राजधानी को स्थाई नहीं कर पाये हैं। यह इच्छाशक्ति की कमजोरी को दर्शाता है।

we and himachalहिमाचल ने लघु जलविद्युत परियोजनाओं का माॅडल और नीति काफी पहले ही तैयार कर ली थी, लेकिन उत्तराखण्ड में बात शुरू करते ही घोटाला हो गया। यह समझ लेना चाहिये कि या तो अपने आप और अपने लोगों को आगे ले जायें या फिर इस राज्य को। ’अपनों के’ और राज्य के हित के बीच टकराव है। कुछ लोगों को गलतफहमी है कि अपने हित से राज्य का हित अपने आप हो जाता है।

यह भी कहा जाता है कि हिमाचल के कई बड़े अफसर और बुद्धिजीवी जो शहरों में नौकरी करते हैं, शनिवार के दिन पहाड़ों पर अपने गांवों की ओर दौड़ते हैं, ताकि रविवार का उपयोग खेत और बगीचों में कुछ श्रम किया जाय। उत्तराखण्ड में उल्टा हुआ। बड़े लोग खेत और बगीचे बेच कर पहले ही देहरादून की तरफ भाग लिये।

सिर्फ 15  साल हुये हैं, उत्तराखण्ड बने हुये। पहले ही परिसीमन में पर्वतीय जिलों की छः विधानसभा सीटें भी मैदान की तरफ भाग गई। फिर भी कोई कुछ समझने के लिए तैयार नहीं है। हिमाचल में ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि वहां ऐसा पलायन भी नहीं हुआ।

काफी सोचने के बाद कि किसी मामले में तो उत्तराखण्ड हिमाचल से आगे निकला होगा, मुख्यमंत्रियों की संख्या पर ध्यान अटक गया। 40 साल में हिमाचल में केवल 6 मुख्यमंत्री हुए हैं, उत्तराखण्ड ने इस मामले में 15 साल में ही बराबरी बर ली। 15 साल में 8 मुख्यमंत्री। औसतन दो साल से भी कम समय में एक। यही प्रगति रही तो 40 साल में कहां पहुंच जायेंगे। देहरादून में सबके लिए बंगले की व्यवस्था तो करनी ही पडे़गी।

कुछ लोगों ने हिमाचल को टक्कर देने की कोशिश की थी, उत्तरांचल नाम रख कर। लेकिन वह भी ज्यादा दिन नहीं चला। काम की न सही नाम की तो टक्कर होती। हिमाचल से बहुत से काम सीखने की जरूरत है।

हमारे यहां विकास भी हुआ है । इतनी निराशा भी नहीं है ।अन्य स्टेट की अपेक्षा हम  आगे हैं । लेकिन हमारे नेता (ताकतवर) गांव में नहीं रहते । तब  अधिकारी भी अपनी मर्जी करते हैं । नेता लोग शुक्रवार को दिल्ली चले जाते हैं और पहाड़ के कर्मचारी  दून  और  हल्द्वानी । गांव के लोग कस्बे में । कमोबेश यह चक्र बना हुआ है ।

पहाड़ के कस्बों  में रौनक है । समाज सेवी  रतन सिंह असवाल का  पलायन  एक चिंतन जुनून मुझे इसलिए  ठीक लगता है ।   कि कम से कम वे पलायन की आपाधापी में कुछ   अपनी टीम के साथ जज्बा व विशवास तो पाले हैं । कि एक  दिन पहाड़ों पर रौनक होगी ।

जब तक  हमारे  नेताओ ने दू दू दू दू  दिल्ली, मुंबई शुक्रवार को नहीं छोड़ा ।तब तक कुछ नहीं गुरु  । दम है तो महीने में एक आध दिन  गांव,  कस्बे में रहें ।जहाँ भैंसे, बेला, गाय, दादा, दादी ,खेत, खलिहान  और पूरा जीवन है । और सबसे बड़ी बात  उतराखंड के ऊपरी लोग अस्सी प्रतिशत शिक्षित हैं । टीवी से  अमेरिका का ज्ञान रखते हैं । उन सब परमात्माओं को अब  बरगलाया नहीं जा सकता ।

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